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अब किताबें झांकती है कंप्यूटर के पर्दो से…

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किताबें झांकती है बंद अलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं महीनें अब मुलाकात नहीं होती जो शाम उनकी सोहबत में कटा करती थीँ अब अक्सर गुजर जाती है कंप्यूटर के पर्दो पर बड़ी बेचैन रहती है किताबें ...       उपरोक्त पंक्तियाँ गुलज़ार साहब ने लिखी है। और सच ही लिखा है। कितने लम्बे आरसे से किताबें हमारी मित्र रही है। समय के साथ साथ उनका रंग - रूप बदला। प्रारंभिक समय में हाथ से लिखी जाने वाली किताबें की जगह धीरे - धीरे छापे खाने से निकली किताबों ने ले ली। हमने किताबें खरीद के पढ़ी , मांग के पढ़ी। अपने घर में उन्हें संजोया।   हम खुद भी नहीं बता सकते की किताबें कबसे हमारी ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन गयी या हमारी अंतरंग मित्र बन गयी ... किताबें हमें समाज के परिस्थितियों , परिवेश एवं कई नए तथ्यों की सूचनाएं प्रदान कर हमारे ज्ञान का वर्धन करती है। साथ ही हमारा मनोरंजन भी करती है । हमें वैचारिक रूप से समृद्ध करती है।  हमें हमारे अतीत , वर्तम...

फरफराते पन्ने ...

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खिड़कियों से हवा यूँ उछल के आयी  कि फरफराने लगे टेबुल  पर रखे पन्ने ...   कुछ कोरे थे तो कुछ सूखी  स्याही से लिपटी  और कुछ अधूरे थे...  उँगलियों ने उनपर पत्थर दाब दिये  पर कहाँ  जाते वो उड़कर ?  वो तो उसी कैद में आज़ाद थे...  ~ देव 

एलिफेंटा की यात्रा

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                                                                                                                                                                                                                                                                     - देवयानी मल्लिक एलिफेंटा मुंबई के प्रवेश द्वार ' गेट वे ऑफ़ इंडिया ' से करीब 1...
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नशा  उतर जाता है,  आदतें भी छूट जाती है, बस वक्त ही नहीं रुकता...  हाथ कब छूट गए पता ही नहीं चला, पर...   कुछ धुँधली यादें है कि मिटती ही नहीं.. जितना भी उनसे हाथ छुड़ाओ  और कश के पकड़ लेती है... हाँ ख्वाब तो अब भी देखती हूँ, पर  ...  अधूरे है सारे नज़ारे ...     ~ देव 

Ae Zindagi Gale Laga Le Take 1 - Dear Zindagi | Alia | SRK | ILAIYARAAJ...

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Here again with nxt edition...

My first work as an editorial writer.

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